कोई भूख से कैसे मरता है?

कोई ये कैसे बताए, कि वो भूखा क्यूं है?

कोई भूख से कैसे मरता है, अगर ये जानना है तो इसको समझने के लिए दुनिया में सिर्फ एक जगह है…वो है झारखंड।

BDO साहब का दावा है कि भुखल के नाम में सिर्फ भूख है, मरा तो वो लंबी बीमारी से है। वहीं भुखल की बीवी रेखा का कहना है कि भुखल अपने नाम का सच्चा था… वो भूखा था, बीमार नहीं।

सवाल है भुखल मरा कैसे ?

रेखा के मुताबिक मंगलवार यानी बीते चार दिन से उसके घर में अन्न का एक दाना भी नहीं था। चार दिन से उसके घर में खाना नहीं बन रहा था। रेखा के पास मनरेगा का जॉब कार्ड था, लेकिन जॉब नहीं था। उसके पास गरीबों का BPL वाला लाल कार्ड भी नहीं था।

कस्मार के बीडियो राजेश कुमार सिन्हा भी कबूल करते हैं भुखल के गांव  करमा में तीन महीने से किसी को पीडीएस से राशन नहीं मिल रहा था। वजह ? technical glitch. टेक्निकल ग्लिच का हिंदी अनुवाद है—राशन कार्ड को आधार नंबर से लिंक किया गया था…जिनका कागजात जमा नहीं हुआ, उनका राशन रद्द।

वैसे शायद अच्छा हुआ कि भुखल मर गया….

भुखल के मरने से उसके घर वालों को तत्काल फायदा हुआ।

जो राशन कार्ड भुखल जीते जी नहीं बनवा सका, वो सरकार खुद बना कर उसके घर में रख आई। सरकार ने भुखल की बीवी को 20 हजार रुपये, 40 किलो चावल, 2 किलो चूड़ा और 1 किलो गुड़ दिया। पंचायत ने भी 2हजार रुपये दिए। अंबेडकर योजना के तहत इस परिवार को आवास देने की बात हो रही है।  जो बीडियो भुखल की मौत के लिए बीमारी को जिम्मेदार बताते हैं, वो खुद शंकरडीह टोला दिन भर घूमे और हर परिवार को दो महीने का राशन दिलवाया, वो भी बिना देखे कि किसके पास बीपीएल कार्ड है, किसके पास नहीं, किसका कार्ड आधार से लिंक है, किसका नहीं।

भुखल पहले बंगलोर में डेली वेज पर काम करता था। छह महीने पहले वो गांव आ गया था। उसकी तबीयत ठीक नहीं रहती थी, वो भारी काम नहीं कर पाता था। इसलिए वो गांव चला आया। उसे इलाज की जरूरत थी, शायद उसे टीबी था, लेकिन उसके पास आयुष्मान भारत कार्ड नहीं था। अगर घोड़ा या मजदूर बीमार हो जाए तो उसका मरना तो बनता है।  

अब डीसी साहब के आदेश से भुखल की बीवी और उसके पांच बच्चों का CBPयानी कंप्लीट बॉडी प्रोफाइल तैयार हो रहा है। अब तक की जांच से पता चला  है कि सारा परिवार एनीमिक ( खून की कमी) है। भुखल का तो नहीं हुआ, लेकिन अब सरकारी खर्च पर रेखा का इलाज होगा। वैसे रेखा से पूछिए तो वो यही कहेगी कि उसे खून की नहीं भूख की बीमारी है या यूं कहें कि अन्न की कमी से उसके शरीर में खून की कमी है।

झारखंड सरकार भुखमरी को कबूल नहीं करती, लेकिन इसके बावजूद ये देश का पहला राज्य है जहां भुखमरी के बाद क्या हो, इसके लिए चार स्तरीय प्रोटोकॉल बनाया गया है।

  1.  24 घंटे के अंदर मौत के कारणों की जांच और परिवार के बाकी लोगों का मेडिकल चेक-अप
  2. 15 दिन के अंदर गांव की आधी आबादी को खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराना और स्वास्थ्य की जांच करना।
  3. सरकारी योजना जैसे पीडीएस से राशन, आयुष्मान योजना के तहत इलाज, अंबेडकर योजना के तहत आवास में कमी का पता लगाकर उसे दूर करना
  4. तीन साल तक गांव की सतत निगरानी। हर तीन महीने पर आंगनबाड़ी वर्कर की गांव के गरीब परिवारों पर रिपोर्ट

लेकिन लातेहार में रामचरण और बोकारो में भुखल की मौत से साफ है कि प्रोटोकॉल का होना काफी नहीं है। क्योंकि जिन पर आबादी को भुखमरी से बचाने की जिम्मेदारी है, उन्हीं पर इस प्रोटोकॉल पर काम करने की भी जिम्मेदारी है।

कहते हैं ….28 सितंबर 2017 के दिन….सिमडेगा की 11 साल की संतोषी भात…भात…भात कहती मर गई। ये सरकार का नहीं उसकी मां का कहना था । तब से गैर सरकारी आंकड़ों में कम से कम 22 संतोषी दर्ज हुए हैं। और ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत लंबी छलांग लगाकर 117 देशों में 102वें रैंक पर पहुंच गया है। उत्तर कोरिया और बरकिना फासो जैसे देश कहीं पीछे छूट गए हैं, इस रेस में हमारा मुकाबला अब यमन, हैती और अफगानिस्तान से है।

ये भी देखें –भुखल की मौत पर सीएम का ट्वीट