फेल लिखना जरूरी है क्या?

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पहली बार केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सी.बी.एस.ई.) ने 12 वीं का परीक्षा परिणाम घोषित करते समय एक महत्वपूर्ण परिवर्तन किया है-अंक तालिका में ‘फेल’ शब्द के स्थान पर ‘एसेंशियल रिपीट’ शब्द लिखा गया है। स्वतंत्रता पश्चात शिक्षा-क्षेत्र में अबतक के निर्णयों में यह सबसे महत्वपूर्ण, मानवतावादी और गरिमायुक्त निर्णय है। किन्तु फेल शब्द केवल इसीबार के लिए हटाया गया है अथवा हमेशा के लिए, यह अभी स्पष्ट नहीं है। यदि यह कोरोना महामारी के कारण उठाया गया कदम है तो भी इसपर विचार कर फेल शब्द को हमेशा के लिए हटा देना चाहिए क्योंकि फेल शब्द भी एक माहमारी ही है जो अनेक प्रतिभाओं को निगल जाती है।

वर्ष पर्यंत किये गए श्रम का मूल्यांकन केवल तीन घंटे की लिखित परीक्षा के आधार पर कर देना भी कोई वैज्ञानिक पद्धति नहीं है। इसमें भी सुलेख, आगे पीछे वाले से थोड़ी बहुत पूछताछ का अवसर, याद किये गए प्रश्नों का ही आ जाना, शिक्षक द्वारा बनवाए गए नोट्स में से प्रश्न-पत्र का मेल खा जाना, स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक की गुणवत्ता और कहीं-कहीं नकल का चल जाना आदि कारकों का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। किन्तु हमारे तंत्र को तो दो ही शब्द भा गए हैं- फेल या पास। चूँकि पास होने वाले नौकरी भी मांगेंगे इसीलिये उनमें फिर से श्रेणी विभाजन। यहाँ भी तृतीय श्रेणी वालों को लगभग अछूत जैसा ही माना जाता है। अब स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि 60-65 प्रतिशत प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों में से भी अधिकांश के माता-पिता विशेष प्रसन्नता व्यक्त नहीं करते। मैंने फेसबुक पर एक भी पोस्ट ऐसी नहीं देखी जिसमें 70 प्रतिशत से कम वाले को भी कोई बधाई देता हुआ दिखा हो। बच्चों के मूल्यांकन की निर्मम पद्धति ने समाज को भी इतना निष्ठुर बना दिया है कि अब उन्हें 90 प्रतिशत से कम पर बधाई देने-लेने में भी संकोच होता है ! प्रथम श्रेणी में भी यह प्रतियोगिता 100 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है, अब इसे और कहाँ तक ले जाओगे? 90-100 प्रतिशत लाने वाले भी हमारे गौरव हैं, उनका अभिनन्दन है किन्तु जिन लोगों में लिखित के स्थान पर मौखिक रूप से विषय संपादन की अधिक क्षमता है उनका क्या?

परीक्षा और रिजल्ट दो ऐसे कठोर शब्द हैं जिनके भय से बड़े-बड़े कम्पित हो उठते हैं। फिर फूल से कोमल बच्चों के मानसिक चित्त की दशा का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। ऐसा कोई वर्ष नहीं बीता जब फेल होने के अवसाद में बच्चों ने आत्महत्या न की हो। कुछ प्रकरणों में आत्महत्या करने के दस-बीस दिन पश्चात् वही बच्चे पुनर्मूल्यांकन में बहुत अच्छे अंकों से उत्तीर्ण भी हुए हैं किन्तु फेल शब्द इतना भयानक और वीभत्स है कि उसका आभास मात्र बच्चों के मानसिक चित्त को क्षत-विक्षत कर डालने के लिए पर्याप्त है।

अँगरेजों ने औपनिवेशिक देशों में अपना राजकाज चलाने के लिए एक शिक्षा व्यवस्था बनाई थी, उस व्यवस्था में जो पास होते थे उन्हें वे अपने यहाँ नौकरी पर रख लेते थे किन्तु स्वतंत्र भारत में क्या जो फेल हो गया वो अब किसी काम का नहीं रहा या वर्ष भर पढ़ने वाले को तीन घंटे में न लिख पाने के कारण फेल घोषित करने का औचित्य समझ से परे है। कितने ही उदाहरण हैं जिनमें हमारी शिक्षा व्यवस्था से फेल का प्रमाणपत्र लेने वालों ने इसी देश में सर्वोच्च पदों पर पहुँचने का कीर्तिमान रचा। वर्तमान में मुंबई पश्चिम के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त डॉ. मनोज कुमार शर्मा भी उन्हीं में से एक हैं।

मध्य प्रदेश के मुरेना जिले के छोटे से गाँव में जन्मे मनोज कुमार 10 वीं की परीक्षा में तृतीय श्रेणी पास होने से खिन्न थे इसीलिये अगली बोर्ड परीक्षा में प्रथम श्रेणी लाने के लिए प्रयासरत थे क्योंकि हमारे देश में तृतीय श्रेणी पास होने वाले को बेकार ही समझा जाता है लेकिन वे 12 वीं की बोर्ड परीक्षा में भी फेल हो गए। इसी 12 वीं फेल छात्र ने अपनी कड़ी मेहनत से आगे चलकर पी.एचडी. तक पढ़ाई की। संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर आई.पी.एस बने और आज देश के बड़े पद पर सबसे बड़े महानगर मुंबई में कार्यरत हैं। ऐसे कितने ही मनोज होंगे जिन्हें हमारी शिक्षा प्रणाली ने फेल का ठप्पा लगाकर उनकी प्रतिभा को न पहचान पाने का प्रमाण दिया होगा। यदि फेल का अर्थ प्रतिभा विहीन नहीं होता तो फेल क्यों लिखा जाए? इस बात में किंचित मात्र संदेह नहीं कि हमारी शिक्षा पद्धति में किसी भी बालक के खिलाड़ी, कलाकार और समाजसेवी आदि होने की प्रतिभा का बोर्ड की अंकसूची में कोई स्थान नहीं है।

डॉ. रामकिशोर उपाध्याय

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)