राज्यसभा चुनाव : जानिए पूरा गणित

राज्यसभा (फाइल)

राज्यसभा में 17 राज्यों की 55 सीटों पर 26 मार्च को होने वाले चुनाव के लिए नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, जो 13 मार्च तक चलेगी। 16 मार्च 2020 को नामांकन की स्क्रूटनी होगी और 18 मार्च तक नामांकन वापस लिया जा सकता है। कांग्रेस और बीजेपी सहित तमाम क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने राज्यसभा की ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। इसी वजह से मध्य प्रदेश में सियासी उथल-पुथल चल रही है और झारखंड में भी दो सीटों के लिए जोड़-तोड़ की राजनीति शुरु हो गई है।

कौन कौन हैं उम्मीदवार?

सत्ताधारी गठबंधन ने अपना एक उम्मीदवार तय कर लिया है। झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन 11 मार्च को विधानसभा परिसर में निर्वाचन पदाधिकारी के पास नामांकन करेंगे। विधानसभा के सचिव ही राज्यसभा में निर्वाचन पदाधिकारी होते हैं। वहीं, जेएमएम ने दूसरा उम्मीदवार तय करने की पूरी जिम्मेदारी अपने दूसरे प्रमुख सहयोगी कांग्रेस पर छोड़ दी है। लेकिन कांग्रेस में अभी तक किसी उम्मीदवार के नाम पर सहमति नहीं बनी है। दूसरी सीट के लिए वोटों का जुगाड़ भी बड़ी समस्या है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि आलाकमान स्तर से ही कोई उम्मीदवार तय होगा।

उधऱ, प्रदेश भाजपा ने केन्द्रीय कमिटी के पास तीन नेताओं, रघुवर दास, दीपक प्रकाश और रवींद्र राय के नाम की अनुशंसा की है। दिल्ली में होने वाली केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में उम्मीदवार का फैसला होगा। वैसे रघुवर दास के उम्मीदवार चुने जाने की काफी संभावना है। रविवार को चुनाव समिति की बैठक में रघुवर दास मौजूद नहीं थे, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री की हैसियत से उन्हें बैठक में शामिल होना चाहिए था। आम तौर पर प्रत्याशी को बैठक से अलग रखा जाता है, और इसलिए उनकी अनुपस्थिति को एक संकेत माना जा रहा है।

रघुवर दास पहली पसंद?

वैसे भी रघुवर दास, गृह मंत्री अमित शाह की पहली पसंद बताये जा रहे हैं। ऐसे में अगर केन्द्रीय समिति बाहर से कोई प्रत्याशी नहीं देती है, तो रघुवर दास की उम्मीदवारी तय है। रघुवर दास ने अपने शासन काल के दौरान वर्ष 2016 के राज्यसभा चुनाव में संख्या बल कम होने की स्थिति में भी भाजपा के खाते में दो सीटें डाली थीं। पिछले चुनाव में भी भाजपा दोनों सीटें जीतते-जीतते रह गई थी। दूसरी सीट पर कांग्रेस के धीरज साहू महज 0.25 वोटों से जीते थे। जाहिर है मौजूदा फंसी हुई परिस्थिति में भी रघुवर तुरुप का पत्ता साबित हो सकते हैं।

राज्यसभा चुनाव का फार्मूला

जरुरी वोटों की संख्या = [(कुल विधायकों की संख्या * 100)/(खाली सीटों की संख्या + 1)] + 1

सीधे शब्दों में समझें, तो झारखंड से 2 राज्यसभा सदस्यों का चयन होना है। इसमें 1 जोड़ने से यह संख्या 3 होती है। अब कुल सदस्य 81 हैं तो उसे 3 से विभाजित करने पर 27 आता है। इसमें फिर 1 जोड़ने पर यह संख्या 28 हो जाती है। यानी झारखंड  से राज्यसभा सांसद बनने के लिए उम्मीदवार को 28 प्राथमिक वोटों की जरूरत होगी।

इसके अलावा वोट देने वाले प्रत्येक विधायक को यह भी बताना होता है कि उसकी पहली पसंद और दूसरी पसंद का उम्मीदवार कौन है।  जिस उम्मीदवार को पहली प्राथमिकता के न्यूनतम आवश्यक वोट मिल जाते हैं, वो जीत जाता है। इसके बाद अगर अन्य सदस्यों के लिए वोटिंग होती है, तो सबसे कम वोट मिलनेवाले उम्मीदवार के वोटों को, दूसरी प्राथमिकता के अनुसार, अन्य उम्मीदवारों को ट्रांसफर कर दिया जाता है। ये सिलसिला तब तक चलता है, जब तक कोई उम्मींदवार विजयी घोषित ना किया जाए।

वोटिंग का हिसाब

झामुमो के पास अपने 29 विधायक हैं, इसलिए पहली सीट जीतने में उसे कोई दिक्कत नहीं होगी। वहीं बीजेपी के पास बाबूलाल मरांडी समेत कुल 26 विधायक हैं। उन्हें आजसू के दो विधायकों की जरुरत पड़ेगी। अगर आजसू राजी हो गई तो बीजेपी बगैर किसी मुश्किल के एक सीट आसानी से निकल लेगी। लेकिन रघुवर के नाम पर आजसू आसानी से राजी होगी, इसे लेकर आशंका बनी हुई है। विधानसभा चुनाव में भी एनडीए गठबंधन से आजसू के अलग रहने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास को ही दोषी माना जाता है। फिलहाल आजसू भी उम्मीदवार का ऐलान होने का इंतजार कर रहा है, उसके बाद ही पार्टी कोई निर्णय लेगी।

बाबूलाल मरांडी का मामला

बीजेपी की दूसरी परेशानी बाबूलाल मरांडी की सदस्यता को लेकर है। निर्वाचन आयोग ने झाविमो के भाजपा में विलय पर मुहर लगा दी है, लेकिन विधानसभा में इस बाबत कोई फैसला नहीं लिया गया है। स्पीकर के मुताबिक फिलहाल बाबूलाल जेवीएम के ही विधायक हैं, और प्रदीप यादव विधायक दल के नेता। ऐसे में अगर दल-बदल कानून का सहारा लेकर स्पीकर ने बाबूलाल की सदस्यता रद्द कर दी, तो बीजेपी की परेशानी बढ़ जाएगी। वहीं बीजेपी के एक विधायक ढुल्लू महतो जो पुलिस से बचने के लिए भागते फिर रहे हैं, अगर वोटिंग से अनुपस्थित रहे, तो बीजेपी को एक और वोट का जुगाड़ करना पड़ेगा।  

ऐसे में बीजेपी के लिए राज्यसभा की एक सीट जीतना भी काफी मुश्किल लग रहा है। इसमें कई पेंच हैं, जिनमें कुछ उसके अपने बनाये हैं और कुछ सत्ताधारी गठबंधन के। राजनीति के इस दंगल में इस बार अखाड़ा है राज्यसभा, और सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों हर हाल में जीतने पर आमादा हैं। इसमें किसकी जीत होती है और किसकी रणनीति काम आती है, ये देखना काफी दिलचस्प होगा।