लौट के ‘बाबू’ घर को आए!

14 साल बाद बाबूलाल लौट के घर आए हैं ।

14 साल शासन में इतना बड़ा अरसा होता है कि केकई ने भगवान राम के लिए इतने वक्त का ही बनवास मांगा था।

झारखंड में बीजेपी को लगता है कि पांच साल का बनवास खत्म करना है तो बाबू लाल की घर वापसी जरूरी है।

2009 से अब तक तीन चुनावों में 11 से 8 और 8 से 3 तक पहुंच कर मरांडी को भी एहसास हो गया है कि झारखंड में अब किंग और किंगमेकर वाली पार्टियों के दिन पूरे हो चुके हैं। दस साल में पांच चुनाव हारने के बाद भी, इस बार चुनाव में सभी 81 सीटों पर  कैंडिडेट खड़े कर कोशिश तो उन्होंने पूरी की, लेकिन.. न वो उद्धव ठाकरे बन पाए न दुष्यंत चौटाला।

रांची के धुर्वा में प्रभात तारा मैदान में एक मिलन समारोह में गृह मंत्री अमित शाह ने मरांडी के बीजेपी में शामिल होने का ऐलान किया। मरांडी केंद्र सरकार में नहीं, पार्टी में शामिल हो रहे थे, ऐसे में इस समारोह में पार्टी अध्यक्ष जे पी नड्डा का नहीं होना साफ इशारा है कि पार्टी बाबूलाल को जरूरत से ज्यादा तवज्जो देने के मूड में नहीं है

गौर करने वाली बात ये है कि, पूरे मिलन समारोह में एक बार भी बाबूलाल और अमित शाह  के बीच आंखों का मिलन नजर नहीं आया। इतना ही नहीं अपने भाषण में अमित शाह ने मरांडी पर ये कह कर चुटकी भी ली कि.झारखंड की जनता का अभिप्राय वो जान गए हैं। यानी जनता ने जेवीएम को तीन सीटों पर समेट दिया तब जाकर बाबूलालजी को बात समझ आई है। इस मीटिंग में अमित शाह के अलावा जो लोग मंच पर अगली कतार में बैठे थे, इन सब में एक समानता ये है कि हाल के महीनों में पार्टी के अंदर इन सभी का कद कम हुआ है। ओम प्रकाश माथुर चुनाव में झारखंड बीजेपी के प्रभारी थे, लक्ष्मण गिलुआ प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे चुके हैं, इनकी जगह जल्द ही नीलकंठ या सीपी सिंह ले सकते हैं। रघुवर दास भी अर्जुन मुंडा की तरह से स्टेट पॉलिटिक्स से बाहर कर दिए गए हैं। प्रदेश महामंत्री धर्मपाल सिंह का कार्यकाल चुनाव के पहले ही खत्म हो चुका है। वो भी गिलुआ की तरह पार्टी के फैसले का इंतजार कर रहे हैं।

बीजेपी को लगता है कि मौजूदा 25 विधायकों में से किसी का कद इतना बड़ा नहीं है कि सदन में हेमंत सरकार को मजबूत विपक्ष का एहसास हो। बाबूलाल में बीजेपी एक मजबूत नेता प्रतिपक्ष देख रही है। आदिवासी नेता के तौर पर बाबूलाल कभी राज्य की सियासत में शिबू सोरेन सा कद हासिल नहीं कर पाए, जाहिर है पार्टी आदिवासी नेता से ज्यादा उनकी ईमानदार छवि को भुनाना चाहती है। रघुवर दास पर सरयू राय के आरोपों के बाद पार्टी भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करने वाली इमेज को रीगेन करना चाहती है।